बसंत पंचमी 2023, निबंध, कब है (Basant (Vasant) Panchami Essay, Date in Hindi)

बसंत पंचमी 2023, निबंध, कब है, किस दिन है, डेट, तारीख, तिथि, विवाह मुहूर्त, कविता, पूजा (Basant (Vasant) Panchami Essay, Date in Hindi) (Tithi, Vivah Muhurat, Kab hai, Time)

देश में मनाए जाने वाले अनेक प्रकार के धार्मिक त्योहारों में बसंत पंचमी भी अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। बसंत पंचमी का त्यौहार खासतौर पर ऐसे लोगों के लिए एक अलग ही महत्व रखता है जो लोग किसी शिक्षण संस्थान में पढ़ते हैं या फिर पढ़ाते हैं। क्योंकि बसंत पंचमी का त्यौहार स्वयं भगवान श्रीकृष्ण और आदिशक्ति माता दुर्गा जी के द्वारा माता सरस्वती जी को समर्पित किया गया है और इसीलिए इस दिन विशेष रूप से पौराणिक काल से ही माता सरस्वती की पूजा अर्चना की जाती चली आ रही है। आज इस आर्टिकल में हम चर्चा करेंगे कि “बसंत पंचमी क्या है” और “बसंत पंचमी क्यों मनाई जाती है” तथा “बसंत पंचमी का महत्व क्या है।”

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बसंत पंचमी 2023 (Basant (Vasant) Panchmi in Hindi)

पर्व का नामबसंत पंचमी
अन्य नामसरस्वती पूजा, श्री पंचमी
अधिष्ठात्री देवीमाता सरस्वती
शुरुआतपौराणिक काल
संबंधित धर्महिंदू
अनुयाईहिंदू धर्म के लोग
उद्देश्यसरस्वती माता की पूजा करना और विद्या की कामना करना
संबंधित देशभारत
तिथि   माघ शुक्ल पंचमी
बसंत पंचमी 2023 में26 जनवरी

बसंत पंचमी क्या है (What is Basant Panchami)

हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले लोगों के द्वारा वसंत पंचमी का त्यौहार मनाया जाता है। इस त्यौहार को बसंत पंचमी के अलावा श्री पंचमी के नाम से भी जाना जाता है। बसंत पंचमी का त्यौहार माता सरस्वती जी को समर्पित किया गया है। हिंदू समुदाय में माता सरस्वती जी को ज्ञान की और विद्या की देवी मानकर पूजन किया जाता है। बसंत पंचमी का त्यौहार पूर्वी भारत के अलावा पश्चिम बांग्लादेश, नेपाल और जहां जहां पर हिंदू समुदाय के लोग निवास करते हैं वहां वहां पर धूमधाम के साथ मनाया जाता है। बसंत पंचमी के मौके पर लोगों के द्वारा नहा धोकर के पीले रंग के कपड़े पहने जाते हैं और उसके पश्चात माता सरस्वती जी की पूजा की जाती है। हिंदू धार्मिक शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी के नाम से उल्लेखित किया गया है, वहीं पुराणों और अन्य ग्रंथों में इसे अलग-अलग नाम दिया गया है। इसे सरस्वती पूजा भी कहा जाता है।

बसंत पंचमी का त्यौहार 2023 किस दिन है (When Basant Panchami is Celebrated)

बसंत पंचमी का त्यौहार माघ शुक्ल पंचमी को आता है। हर साल इसकी तारीख में बदलाव होता रहता है। साल 2021 में बसंत पंचमी 28 जनवरी और साल 2022 में बसंत पंचमी 5 फरवरी को थी, वहीं साल 2023 में बसंत पंचमी का त्यौहार 26 जनवरी दिन गुरुवार को मनाया जाएगा।

बसंत पंचमी का महत्व (Basant Panchami Importance)

बसंत पंचमी का मुख्य महत्व प्रकृति में नव निर्माण के कारण हुए आनंद को व्यक्त करना और स्वयं भी आनंदित होना है। बसंत पंचमी के महीने में ही खेतों में सरसों की फसल बिल्कुल तैयार हो जाती है। इसके अलावा धान की कटाई भी काफी जोरों पर होती है। इस दिन खेतों में पैदा हुई फसल को घर पर लाया जाता है और उसे भगवान को समर्पित किया जाता है। मथुरा, वृंदावन और राजस्थान जैसे इलाकों में बसंत पंचमी के मौके पर स्पेशल त्योहारों का आयोजन किया जाता है। इसके अलावा इस दिन सूर्य देव, भगवान भोलेनाथ, गणपति महाराज और इंद्र देवता की भी पूजा अर्चना की जाती है। वसंत ऋतु में ही पेड़ों पर नए पत्ते आते हैं और प्रकृति में काफी सुहावने बदलाव होते हैं। यही वजह है कि मनुष्य भी इस मौसम में काफी प्रसन्न रहता है। इसके साथ ही साथ प्रयागराज जैसे शहरों में कुंभ अथवा अर्ध कुंभ का आयोजन भी बसंत पंचमी के महीने में ही होता है, जहां पर श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं।

बसंत पंचमी में सिर्फ इंसानों को ही उल्लास की प्राप्ति नहीं होती है, बल्कि पशु-पक्षी भी उल्लास से भरे हुए होते हैं। वैसे तो पूरा का पूरा माघ महीना ही उत्साह देने वाला होता है परंतु हम इंसानों के लिए और उस पर भी खासतौर पर हिंदू समुदाय के लोगों के लिए बसंत पंचमी का त्यौहार बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। पौराणिक काल से ही बसंत पंचमी के त्यौहार के मौके पर माता सरस्वती जी की पूजा की जाती है, क्योंकि इसी दिन को सरस्वती जी का जन्मदिन माना जाता है। इसलिए लोगों के द्वारा इस मौके पर माता शारदे की पूजा करके उनसे विद्यावान और ज्ञानवान होने की कामना लोगों के द्वारा की जाती है। इसके अलावा यह दिन नाटककार, कवि, लेखक, गायक, नृत्य कार के लिए भी महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि वह इसी दिन अपने उपकरणों की पूजा करते हैं और माता सरस्वती जी का वंदन-अभिनंदन करते हैं।

बसंत पंचमी क्यों मनाई जाती है एवं इतिहास (Why Basant Panchami is Celebrated and History)

उपनिषद में वर्णित कथा के अनुसार सृष्टि के शुरुआत के काल में ही भगवान भोलेनाथ की आज्ञा पाने के बाद ब्रह्मा जी के द्वारा विभिन्न जीव की रचना की गई। हालांकि ब्रह्मा जी इसके पश्चात भी अपनी रचना से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे उन्हें कुछ ना कुछ कमी लग रही थी। इसी वजह से चारों तरफ मौन छाया हुआ था। तब काफी लंबे समय के पश्चात ब्रह्मा जी के द्वारा इस समस्या से निजात पाने के लिए अपने कमंडल में मौजूद जल अपने हाथ में लिया गया और संकल्प लेते हुए उस जल को छिड़ककर के भगवान विष्णु जी की स्तुति करना शुरू की गई। ऐसा करने से तुरंत ही भगवान विष्णु जी ब्रह्मा जी के सामने प्रकट हुए और ब्रह्मा जी के द्वारा तब अपनी समस्या व्यक्त की गई।

इस पर विष्णु जी के द्वारा आदिशक्ति माता दुर्गा जी का आवाहन किया गया। इस पर दुर्गा जी प्रकट हुई तब विष्णु जी और ब्रह्मा जी के द्वारा दुर्गा जी से इस संकट को दूर करने के लिए प्रार्थना की गई। इसके पश्चात दुर्गा जी की बॉडी में से सफेद रंग का एक बहुत ही विशाल तेज पैदा हुआ जो थोड़ी देर के पश्चात एक अलौकिक नारी में तब्दील हो गया। इन्हीं देवी को माता सरस्वती कहा गया। माता सरस्वती के प्रकट होने के पश्चात आदिशक्ति दुर्गा जी के द्वारा ब्रह्मा जी से कहा गया कि यही देवी सरस्वती आपकी अर्धांगिनी बनेगी और यही आपकी शक्ति होंगी। इतना कहने के बाद दुर्गा माता कुछ ही समय में वहां से अंतर्ध्यान हो गई। इसके बाद सभी देवी देवता सृष्टि के संचालन में लिप्त हो गई। माता सरस्वती जी को भगवती, शारदा, वीणावादिनी, वाग्देवी, वाघेश्वरी जैसे नामों से जाना जाता है। इन्हें बुद्धि और विद्या की देवी कहा जाता है। इनके हाथों में वीणा होती है।

एक कहानी के अनुसार सरस्वती जी से अत्यंत प्रसन्न होकर के भगवान श्री कृष्ण के द्वारा उन्हें इस बात का वरदान दिया गया कि जब कभी भी बसंत पंचमी आएगी तब तुम्हारी पूजा लोगों के द्वारा की जाएगी और इसके परिणाम स्वरूप तब से लेकर के हर वर्ष बसंत पंचमी के मौके पर विद्या की देवी माता सरस्वती की पूजा की जाती है।

बसंत पंचमी की कथा (Basant Panchami Story)

पौराणिक कथा के अनुसार बसंत पंचमी महाकवि कालिदास जी से भी संबंध रखती है। प्राप्त जानकारी के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि कालिदास की पत्नी ने जब उन्हें छोड़ दिया था तो उसके पश्चात कालिदास जी अत्यंत दुखी हुए और इसी दुख में वह आत्महत्या करने के विचार से एक नदी के पास पहुंचे। जैसे ही उनके द्वारा नदी में आत्महत्या करने के लिए छलांग लगाने का प्रयास किया गया, वैसे ही माता सरस्वती जी नदी के जल से बाहर निकली और कालिदास के सामने प्रकट हुई और सरस्वती जी के द्वारा कालिदास जी को नदी के जल में स्नान करने के लिए आदेश दिया गया। इसके पश्चात से ही कालिदास के जीवन में अत्यंत सुखद बदलाव हुए और वह महा ज्ञान को प्राप्त करने में सफल हो गए।

बसंत पंचमी में किसकी पूजा होती है (Who is Worshiped on Basant Panchami)

धार्मिक कथा के अनुसार माता सरस्वती जी का जन्म भी बसंत पंचमी के दिन ही हुआ था और सबसे पहले बसंत पंचमी के दिन पर इन्हीं की पूजा किया जाना शुरू किया गया था। इसलिए इस दिन विद्या की देवी सरस्वती जी की भी पूजा की जाती है। इसके अलावा एक अन्य कहानी के अनुसार ऐसा माना जाता है कि इसी दिन कामदेव मदन की पैदाइश धरती पर हुई थी और इसीलिए लोग अपने दांपत्य जीवन को सुखी बनाने के लिए बसंत पंचमी के मौके पर रति मदन की पूजा करते हैं और इनसे अपने वैवाहिक जीवन को सुखी रखने की प्रार्थना करते हैं। वैसे देखा जाए तो मुख्य तौर पर माता सरस्वती जी का ही इस दिन पूजन किया जाता है। इसके अलावा वसंत पंचमी के दिन को ही माता सरस्वती के अलावा लक्ष्मी जी का भी जन्मदिन माना जाता है। इसलिए वसंत पंचमी को श्री पंचमी भी कहा जाता है। इस दिन लोगों के द्वारा सुबह के समय में अभ्यंग स्नान किया जाता है और पूजा अर्चना की जाती है। इस मौके पर विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती जी की पूजा और प्रार्थना करने का काफी महत्व है। ब्राह्मण शास्त्र के अनुसार माता सरस्वती जी कामधेनु और सभी देवताओं की प्रतिनिधि मानी जाती है। यही लोगों को विद्या प्रदान करने का काम करती है और लोगों को कुशाग्र बुद्धि वाला बनाती है।

बसंत पंचमी कैसे मनाई जाती है (How Basant Panchami is Celebrated)

  • वसंत पंचमी के मौके पर सुबह-सुबह लोगों के द्वारा उठकर के साफ पानी से स्नान किया जाता है, उसके पश्चात सफेद रंग के या फिर पीले रंग के कपड़े पहने जाते हैं।
  • इसके पश्चात माता सरस्वती जी की प्रतिमा या फिर फोटो की स्थापना की जाती है और माता के सामने ही एक कलश को भी स्थापित किया जाता है।
  • उसके पश्चात ब्राह्मणों के द्वारा मंत्रोच्चार करके माता सरस्वती जी को कलश में आने के लिए निमंत्रण दिया जाता है।
  • इसके पश्चात ब्राह्मणों के द्वारा मंत्रोच्चार के साथ माता सरस्वती जी की पूजा अर्चना शुरू की जाती है, साथ में इस पूजा का आयोजन करवाने वाले सभी लोग रहते हैं और माता सरस्वती जी की आरती गाकर उनसे मंगल कामना करते हैं। इसके पश्चात प्रसाद का वितरण भक्तों में किया जाता है।
  • इस दिन विद्यार्थियों के द्वारा अथवा शिक्षण संस्थान के लोगों के द्वारा स्कूल अथवा कॉलेज को तोरण से सजाया जाता है और माता सरस्वती जी के ऊपर आधारित निबंध प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाता है।
  • स्कूल और शिक्षण संस्थानों में बसंत पंचमी के त्यौहार की सबसे ज्यादा धूम देखी जाती है।

बसंत पंचमी पूजा विधि (Basant Panchami Pooja Vidhi)

देशभर में अलग-अलग प्रदेशों में बसंत पंचमी का त्यौहार अलग-अलग रीति रिवाजों के अंतर्गत मनाया जाता है। कुछ इलाकों में सरसों की खेती के लिए इस दिन किसानों के द्वारा सूर्य भगवान की पूजा की जाती है और उन्हें धन्यवाद दिया जाता है। वही लोगों के द्वारा इस दिन हवन का आयोजन भी किया जाता है। इसके अलावा कुछ जगह पर इस दिन लोगों के द्वारा गरीब लोगों को दान देने की परंपरा का भी पालन किया जाता है। हालांकि इस त्यौहार में एक बात कॉमन है और वह यह है कि इस दिन देशभर में माता सरस्वती जी की पूजा की जाती है। बसंत पंचमी पूजा विधि के अनुसार –

  • इस दिन लोग सुबह उठकर स्नान करते हैं और साफ और स्वच्छ पीले कपड़े ग्रहण करते हैं।
  • इसके पश्चात लोगों के द्वारा उत्तर दिशा में लकड़ी का पाटन बिछाया जाता है और उस पर लाल और उसके बाद पीला कपड़ा बिछाकर के शुद्ध चावल के द्वारा अष्ट कमल का निर्माण किया जाता है।
  • इसके आगे वाले भाग में गणेश जी की स्थापना की जाती है और उसके बाद सबसे पहले गणेश जी की पूजा लोगों के द्वारा की जाती है और गणेश जी को मिठाई अर्पित की जाती है।
  • इसके पश्चात कामदेव की पूजा की जाती है और फिर माता सरस्वती जी की पूजा की जाती है। सरस्वती माता को इस दिन गेहूं, सरसों और अन्य फसल का भोग लगाया जाता है।
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FAQ

FAQ

Q : बसंत पंचमी का इतिहास क्या है?

Ans : पौराणिक कथा अनुसार माता सरस्वती के जन्म से बसंत पंचमी का त्यौहार मनाया जा रहा है।

Q : बसंत पंचमी का मतलब क्या होता है?

Ans : बसंत पंचमी अर्थात श्री पंचमी एक हिंदू त्यौहार है। इस दिन माता सरस्वती की पूजा होती है।

Q : बसंत पंचमी का त्यौहार क्यों मनाते हैं?

Ans : विद्या की देवी सरस्वती जी को समर्पित यह दिन उनके जन्मदिन के तौर पर मनाते हैं।

Q : बसंत पंचमी के दिन किसका जन्म हुआ?

Ans : माता सरस्वती, राजा भोज

Q : बसंत पंचमी कब मनाया जाता है?

Ans : माघ महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी को।

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