महर्षि दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय, जयंती (Maharishi Dayanand Saraswati Biography, Jayanti in Hindi)

महर्षि दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय, जयंती, जीवनी, धार्मिक विचार, सामाजिक विचार, राजनीतिक विचार, शिक्षा संबंधी विचार, रचना, मृत्यु, विश्वविद्यालय, धर्म, जाति (Maharishi (Swami) Dayanand Saraswati Biography, Jayanti in Hindi) (Indian Philosopher, Caste, Quotes, Death)

स्वामी दयानंद सरस्वती, आर्य समाज के संस्थापक के रूप में पूजे जाते हैं। ये महान देशभक्त और मार्गदर्शक थे। जिन्होंने समाज के लिए कई कार्य किए। जिससे लोगों को नई दिशा और ऊर्जा प्राप्त हुई। हमारे देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी उनके विचारों पर काफी प्रभावित रहा करते थे। उन्होंने भारतीय छात्रों को अंग्रेजी के साथ-साथ वेदों का ज्ञान भी प्राप्त कराया था। जिसके कारण एंग्लो-वैदिक स्कूलों में शिक्षा प्रणाली में काफ अहम बदलाव देखने को मिला। वह हमेशा वैदिक धर्म में विश्वास रखा करते थे। साथ ही कुरीतियों और अंधविश्वास का हमेशा विरोध करते थे। इसके अलावा और क्या किया करते थे, उसके बारे में आज हम बात करेंगे साथ ही उनके जीवन के कुछ पहलूओं के बारे में भी विचार करेंगे।

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महर्षि दयानंद सरस्वती की जीवनी (Maharishi Dayanand Saraswati Biography in Hindi)

पूरा नाममहर्षि दयानंद सरस्वती
अन्य नाममूल शंकर तिवारी
प्रसिद्धिआर्य समाज के संस्थापक
जन्म12 फरवरी, 1824
जन्म स्थानटंकारा, काठियावाड़, गुजरात
मृत्यृ की तारीख30 अक्टूबर 1883
नागरिकताभारतीय
गुरूविरजानंद दंडीशा
धर्महिंदू
जातिब्राह्मण
पेशासामाजिक नेता, दार्शनिक
वैवाहिक स्थितिअविवाहित
पिता का नामकरशनजी लालजी कपाड़ी
माता का नामयशोदाबाई
बहनपता नहीं

महर्षि दयानंद सरस्वती का जन्म, परिवार एवं शुरूआती जीवन (Birth, Family and Early Life)

महर्षि दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा में हुआ। वह एक ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता करशनजी लालजी कपाड़ी एक अमीर व्यक्ति थे। इसलिए उन्हें कभी किसी प्रकार की कोई कमी नहीं हुई। उन्होंने अपना बचपन विलसिता में रहकर बिताया। ऐसा कहा जाता है कि, उनके परिवार में उनके माता-पिता के अलावा घर में एक छोटी बहन भी थी। जिसकी मृत्यृ बहुत समय पहले हैजा से हो गई थी।

महर्षि दयानंद सरस्वती जी के जीवन में आये बदलाव (Life Changing Time)

महर्षि दयानंद सरस्वती एक साधारण व्यक्ति थे। जो हमेशा अपने पिता की बात मानकर ही कार्य किया करते थे। ब्राह्मण होने के कारण वह हमेशा धार्मिक अनुष्ठानों में लगे रहते थे। एक बार उनके पिता ने उन्हें महाशिवरात्री का उपवास करने को कहा। उनकी आज्ञा मानकर उन्होंने व्रत का पालन किया। जिसके बाद वो मंदिर में जाकर एक पालकी में बैठ गए। जब आधी रात बीती तो उन्होंने देखा की चूहों का झूंड भगवान को घेरकर उनका प्रसाद खा रहे थे। तब उन्हें पता चला की ये एक मूर्ति है जो अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकती। उसी एक घटना का प्रभाव मूलशंकर के जीवन पर पड़ा और उन्होंने आत्मज्ञान की प्राप्ति की और अपना घर छोड़कर स्वयं को ज्ञान के जरिए मूलशंकर तिवारी से महर्षि दयानंद सरस्वती बना दिया।

महर्षि दयानंद सरस्वती के जीवन में गुरू का महत्व (Importance of Guru)

ज्ञान प्राप्त करने के लिए महर्षि दयानंद सरस्वती स्वामी विरजानंद से मिले और उन्हें अपना गुरू बनाया। उन्होंने ही उन्हें वैदिक शास्त्रों का अध्ययन करवाया। इसी के साथ योग शास्त्र का ज्ञान भी प्राप्त कराया। जब उन्होंन अपनी शिक्षा पूरी की तो उन्होंने अपने गुरू से दक्षिणा के बारे में पूछा। उन्होंने कहा की अगर कुछ देना चाहते हो तो इस समाज से व्याप्त कुरूतिया और अंधविश्वास को खत्म कर दो। लोगों को समझाना की परोपकार ही धर्म है। गुरू का मार्गदर्शन मिलने के बाद महर्षि दयानंद सरस्वती ने वैसे ही करने का विचार किया। उन्होंने वैदिक शास्त्रों का ज्ञान लोगों तक पहुंचाना शुरू किया। लेकिन इसके लिए उन्हें काफी अपमानित होना पड़ा। इसी के साथ लोगों का गुस्सा भी सहना पड़ा। लेकिन वो अपने मार्ग पर डटे रहे। एक दिन उन्होंने आर्य समाज की स्थापन की।

महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की (Aarya Samaj)

साल 1875 में इन्होंने गुड़ी पाड़वा के दिन मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की गई। इसका मुख्य उदेद्श्य था धर्म, मानव सेवा, कर्म और वैदिक ज्ञान को आगे बढ़ाना। जिससे लोगों की मानसिक, शारीरिक और सामाजिक स्थिति सही रह सके। इन्हीं विचारों के साथ स्वामी जी ने आर्य समाज की नींव रखी। जिससे कई विद्वान प्रेरित हुए। कई लोगों ने उनका विरोध भी किया। लेकिन कामयाब नहीं हो सके।

महर्षि दयानंद सरस्वती का सन 1857 क्रांति में योगदान (Dayanand Saraswati in 1857 War)

1846 में अपने घर से निकलने के बाद उन्होंने अंग्रेजो के खिलाफ बोलना शुरू किया। उन्होंने भ्रमण के दौरान जाना कि, अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोगों में काफी आक्रोश है। इसलिए उन्होंने लोगों को इक्टठा किया। उस समय स्वामी जी से कई सारे महान वीर प्रभावित हुए। जिनमें तात्या टोपे, नाना साहेब पेशवा, हाजी मुल्ला खां आदि शामिल थे। ये सभी लोग स्वामी जी के कहे अनुसार काम किया करते थे। इसको आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने रोटी और कमल योजना शुरू की। जिसके लिए उन्होंने आजादी के समय लोगों को जोड़ने का काम किया। हालांकि 1857 में जो उन्होंने क्रांति शुरू की वो विफल साबित हुई। लेकिन स्वामी जी ने फिर भी हार नहीं मानी। उनके विचारो ने लोगों को जोड़कर रखा और हौसला बनाए रखा।

महर्षि दयानंद सरस्वती के विचार (Dayanand Saraswati Thoughts)

बाल विवाह (Child Marriage)

महर्षि दयानंद सरस्वती ने उस समय चलने वाली बाल विवाह का जमकर विरोध किया। उन्होंने कहा की हमारे शास्त्रों में लिखा है कि, मानव जीवन में 25 साल की उन्नति ब्रह्माचर्य की है। जिसके अनुसार बाल विवाह एक अपराध है। अगर किसी बच्चे की शादी बालपन में कराई जाती है तो वो व्यक्ति कमजोर हो जाता है। जिसके कारण उसकी अकाल मृत्यृ हो जाती है।

सती प्रथा (Tradition of Sati)

कई वर्षों से चली आ रही सती प्रथा का भी उन्होंने जमकर विरोध किया उन्होंने कहा मानव जाति को हमेशा प्रेम और सम्मान की भावना सिखाई जाती है। इससे परोपकार बढ़ता है। ऐसे में इस सती प्रथा को खत्म करना चाहिए।

महिला शिक्षा और समानता (Women’s Education and Equality)

आज के समय में भले ही महिला शिक्षा और समानता में एक है लेकिन इसकी सबसे पहले शुरूआत महर्षि दयानंद सरस्वती द्वारा की गई। वह हमेशा महिला सश्किरण को बढ़ावा देते थे। उनका कहना था कि, महिला शिक्षित होगी तो वो एक साथ दो परिवारों को शिक्षित कर पाएगी। इसलिए उन्हें शिक्षा का अधिकार होना चाहिए। इससे वो समाज में सुधार लाने का भी कार्य कर पाएगी।

हिंदी भाषा का महत्व (Importance of Hindi Language)

वैदिक प्रचार के कारण स्वामी जी देश के अलग-अलग कोने में संदेश किया करते थे। जिसके कारण वो संस्कृत शैली को अच्छे से जानने लगे थे। उन्होंने बचपन से ही संस्कृत भाषा को पढ़ना और बोलना सीखा था। इसलिए उन्हें वेद पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं होती थी। लेकिन एक बार वो केशव चंद्र से मिले। जिन्होंने उन्हें सुझाया की उन्हें अपनी भाषा को हिंदी में बदलनी चाहिए ताकि आम व्यक्ति उसे आसानी से समझ सके। फिर उन्होंने साल 1862 में हिंदी बोलना सिखी। उसके बाद ही उन्होंने हिंदी को मातृभाषा बनाने का संकल्प लिया।

महर्षि दयानंद सरस्वती की मृत्यृ (Maharshi Dayanand Saraswati Death)

साल 1883 में महर्षि दयानंद सरस्वती जोधपुर के महाराज के पास गए। राजा यशवंत ने उनका काफी आदर सत्कार किया। वह हमेशा उनके व्यख्यान सुना करते थे। एक दिन राजा ने नर्तकी के साथ व्यस्त थे। ये सब स्वामी जी भी देख रहे थे। जिसके बाद उन्होंने राजा को समझाया। राजा को उनकी बात समझ आई और नर्तकी से सारे रिश्ते खत्म कर लिए। इस कारण नर्तकी स्वामी जी से नाराज हो गई। उसने रसौईये के साथ मिलकर उनके खाने में कांच डलवा दिए। जिसके कारण स्वामी जी की तबीयत खराब होने लगी और 30 अक्टूबर 1883 में वो इस दुनियां को अलविदा कह गए।

महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती (Maharshi Dayanand Saraswati Jayanti)

महर्षि दयानंद सरस्वती साल 2023 में 15 फरवरी को है। इस दिन इसे पूरे देश में मनाया जाएगा। इस दिन महर्षि दयानंद सरस्वती के कार्यों को याद किया जाएगा।

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FAQ

FAQ

Q : महर्षि दयानंद सरस्वती का जन्म कब हुआ?

Ans : महर्षि दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी, 1824 में हुआ।

Q : महर्षि दयानंद सरस्वती की मृत्यृ कब हुई?

Ans : महर्षि दयानंद सरस्वती की मृत्यृ 30 अक्टूबर 1883 को हुई।

Q : महर्षि दयानंद सरस्वती कौन सी भाषा जानते थे?

Ans : महर्षि दयानंद सरस्वती संस्कृत भाषा जानते थे।

Q : महर्षि दयानंद सरस्वती किस समाज की स्थापना की?

Ans : आर्य समाज की

Q : महर्षि दयानंद सरस्वती के गुरु का नाम क्या था?

Ans : स्वामी विरजानंद

Q : महर्षि दयानंद सरस्वती किसके भक्त थे?

Ans : महर्षि दयानंद सरस्वती भगवान शिव के भक्त थे।

Q : महर्षि दयानंद सरस्वती का बचपन का क्या नाम था?

Ans : महर्षि दयानंद सरस्वती का बचपन का नाम मूल शंकर तिवारी था।

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